वही हसरत मेरे अंदर तलक अब तरोताज़ा है ।
उमर का कोई भी मंज़र उसे धुंधला न कर पाया ।।1।।
कि जिस जज़्बात के बूते तलक ज़िंदा रहा हूँ मैं ।
गमों का कोई भी चाबुक उसे कमतर न कर
पाया ।।2।।
दिया है जख़्म दुनिया ने भले ही लाख इस दिल पर ।
समंदर दर्द का  हस्ती डुबो अब तक नहीं पाया ।।3।।
मैं हारा हर कदम उससे कि जिसकी जीत थी मुश्किल ।
मगर वो जीतकर मुझसे कि मुझको जीत न पाया ।।4।।
सुना कमज़ोर होते हैं ये धागे रिश्ते नातों के ।
पर इन कमजोर धागों को मैं अब तक तोड़ न पाया ।।5।।
मिलाकर हाथ मुझसे ही रचे साज़िश ज़माने ने ।
ख़िलाफ़त मेंरे जज़्बे को झुका अब तक नहीं पाया ।।6।।
मैं अक़्सर था मैं अक़्सर हूँ रहूँगा और अक़्सर मैं
मैं हूँ अल्फ़ाज़  न कोई दौर मुझको ख़त्म कर पाया ।।7।।
लिखूँ मैं और क्या और क्यूँ कि लिखने से मिलेगा क्या ।
हक़ीक़त मेंरे लफ्जों का कोई अब तक न पढ़ पाया ।।8।।

                                 ️ वशिष्ठ वत्स





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